यज्ञोपवीत का ही संक्षिप्त रूप है जो ‘जन’ और ‘ऊ’ के मिलने से बना है । ग्रामीण लोग अधिकांषतः इसी षब्द का प्रयोग करते है ।
लघुषंका या दीर्घषंका के समय जनेऊ को अपवित्र होने से बचाने के लिए उसे खींचकर कानों पर चढ़ाते है । दूसरा कारण यह है कि जनेऊ कान पर चढ़ा हुआ देखकर दूसरे व्यक्ति दूर से ही समझ जाते है कि ये लघुषंका से अथवा दीर्घषंका से आये है और अभी हाथ -पैर का मुँंह का प्रक्षालन नहीं किये हैं ।
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